चतूर जाँदूगर और सिधा-साधा कल्लू बेचारा

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एक समय की बात है। एक आदमी होता है।जिसका नाम कल्लू होता है। वह अपने गाँव से शहर जा रहा होता है। उसके परिवार वाले उसके लिए ढ़ेर सारे पकवान बना कर। उसके रास्ते के लिए दे देते हैं। वह सारे पकवान उसकी जोरू बनाती हैं। पुरा परिवार उसको घर से थोड़ा दूर तक छोड़ने आता है। उसकी माँ एक लौटे में पानी लेकर चलती है। थोड़ी दूर बाद उसकी माँ उस लौटे का पानी पिला देती है। फिर सारा परिवार वापस आ जाता है। अब वह चलते-चलते एक गाँव में पहुँचता है। जहाँ पर खुब बड़ा बाज़ार लगा होता है। वह उस बाज़ार में कुछ खरदने के लिए चला जाता हैं। वह देखता है। बहाँ पर एक आदमी बहुत अच्छा जाँदू कर रहा होता हैं।

उसको देखकर कल्लू बड़ा खुश होता हैं। उसके मन में एक बात आती हैं।क्यों न मैं यहीं इसके साथ काम कर लू। कुछ पैसे भी कमा लूगा और अपने परिवार को भी भिजबा दिया करूगा। अब वह पूरा जाँदू देखता है। जब तक जाँदू खतम नहीं हो जाता है। अन्त में जब सब चले जाते है। तो कल्लू बहीं पहुँचकर उस जाँदूगर के पैरों पर गिर जाता है। कहनें लगता हैं, मुझको अपना चेला बना लो। मैं आपकी बहुत सेबा करूगाँ। जाँदूगर बहुत समझाता है। लेकिन कल्लू उसकी एक नहीं सुनता है। वह अपनी जिंद में अड़ा रहता है। जाँदूगर बहुत चतूर और लालची था। उसने उसको अपने पास रख लिया।

कुछ दिनों तक तो खूब अच्छे से गुजरे। लेकिन एक दिन जाँदूगर ने कल्लू को एक काम दिया। तुम इस छड़ से मुझको कबूतर बना कर बापस ईनसान बना देना। पर कल्लू से वह काम नहीं हुआ। उसने कबूतर की जगह उसको कुत्तिया बना दिया। फिर खुब उसका मजाक बनाया। इससे जाँदूगर बहुत गुस्सा हुआ। एक दिन के बाद जब जाँदू खतम हो गया। तो उसने कल्लू को गधा बना दिया। अब कल्लू को लगा ,कि वह भी एक दिन में सही हो जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ बेचारा कल्लू कूछ न कर सका। कुछ दिनों तक खुब काम करबाया गया। कुछ दिनों तक तो खाना भी नहीं दिया कल्लू को। कुछ दिनों बाद उसने कल्लू को सही किया। कल्लू बहूत ही कमजोर पड़ गया था। बेचारा कल्लू बहुत बेबस था। वह कुछ नहीं कर पा रहा था।

एक दिन जाँदूगर की छड़ी कल्लू को मिल गई। जाँदूगर कहीं जाँदू करने गया था। तो कल्लू ने उस छड़ से एक बैसी ही किताब बना कर रख ली। जिससे वह उसका जाँदू सिख कर उसको सबक सिखा सके। जैसे ही जाँदूगर बापस आया। तो उसने जाँदूगर को उसकी झड़ी दे दी। जाँदगर ने गुस्से में आकर उसको मँछली बना दिया। फिर उसको एक काँच के बरतन में रख दिया। जहाँ वह जाँदू की किताब रखता था। बहीं कल्लू को रख दिया। अब कल्लू को बस कुछ दिखता था। उसने सब जाँदू देख कर सिख लिया। एक दिन तो उसने अपने आपको बापस कर आदमी बना लिया। उसको अब उस दिन का ईन्तजार था। जब वह आपनी किताब और जाँदू की छड़ को अकेला छोड़ कर जाए।

यहाँ उसके परिवार परेशान होए। उसकी जोरू तो खुब रोए और उसकी माँ तो रोज पुजा करने के लिए। गाँव से दूर मन्दिर जाया करे। उसका परिवार कल्लू को बहुत चाहता था। अखिर कार कल्लू की माँ की बिनती भगवान ने सुन ली। जाँदूगर अपनी किताब और छड़ी दोनों को छोड़ कर चला गया। कल्लू ने तुरन्त अपना रूप बदला और दोनों चीजों को लेकर भाग निकला। जाँदूगर को इसकी भनक लग गई। उसने तुरन्त उसको पकड़ने की कोशिश की। लेकिन कुछ कर न सका। कल्लू ने ऐसा जाँदू किया ,कि वह कुत्तिया बन गया। अब उसका जाँदू काम नहीं कर पा रहा था। क्योंकि उसकी किताब और छड़ उसके पास नहीं थी। कल्लू कबूतर बन कर आकाश में उड़ गया।

वह उड़ते-उड़ते अपनी माँ की गोद में बैठ गया। उसकी माँ बहुत रो रही थी। कल्लू ने तुरन्त अपना रूप बदला और अपने असली रूप में आ गया। जैसे ही उसकी माँ ने उसको देखा। तुरन्त गले लग कर रोने लगी। उसकी जोरू भी आ गई। वो तो बहुत ही खुश हुई। जब उसने अपने पती को देखा। उसका परिवार बही पर आ गया। फिर कल्लू को अन्दर ले गए। अब कल्लू ने सब कुछ बारीकि से बताया। पूरा परिवार ध्यान से सुनने लगा। अन्त में उसकी माँ कहती हैं। चलो भगवान का शुकृ है। तू बापस आ गया। अब कल्लू का परिवार बहुत खुश था। कल्लू भी अब बहुत अच्छा जाँदूगर बन गया था।

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