तिरलोक ने किया विचार का अचार

मनोरंजन कहानी

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एक छोटा सा गाँव था। उस गाँव में बहुत गरीबी थी। बहाँ के लोग बहुत ही गरीब और बहुत ज्यादा बेबकूफ थे। पर कुछ लोग समझदार भी थे।यदि कोई व्यक्ति उनसे कुछ पूछे तो। सब कुछ तुरन्त बता देते थे। अनजान व्यक्ति को भी बहाँ के लोग अपनी जानकारी तुरन्त दे देते थे। फिर कोई भी उसका गलत प्रयोग कर ले चाहे। ऐसे ही एक बहुत बड़ा मूर्ख था। जिसका नाम तिरलोक था। वह उस गाँव का मूर्ख व्यक्ति था। चाँद नगर में उसका एक बहुत छोटा घर था। एक बार उस गाँव में एक बैठक होनी थी। जिसमें सभी को आना था।अब तिरलोक के पिताजी ने कहा ” बेटा अब तुम बड़े हो गए हो। दो दिन बाद जो गाँव में बैठक होने वाली है। उस पर अपने विचार दे आना।
अब तिरलोक परेशान। ये विचार क्या होता है। शायद जिस प्रकार अचार मिलता है। यह भी मिलता होगा। कहाँ मिलेगा ये। उसने सोचा शायद दूकान में मिलेगा। वह एक दूकान में गया और कहा। भाई विचार कितने रूपए किलो दिए आपने ?। अब दुकानदार बोलता है। ये कौन-सा फल या सब्जि है भाया ? किस काम में प्रयोग की जाती हैं। तिरलोक कहता है। यह किसी बैठक में दिए जाते हैं। इतना कहकर वह बहा से चला जाता है। अब दुकानदार परेशान और सोचता है। जरूर कोई नया फल होगा। मैं कल बाज़ार जाकर इसको लेखर आता हूँ।
जैसे ही सुबह होती हैं। दुकानदार निकल पड़ता है विचार की खोज में। जो की कही नहीं मिलना था। अब वह हर बड़ी दुकान में जाकर पूछे विचार है क्या ? सभी एक ही जबाव दे नहीं है। दुकानदार को विचार को ढूढ़ते-ढूढ़ते शाम हो गई। लेकिन विचार नहीं मिला। वह निराश होकर अपने घर पहुँचा। तो उसकी पत्नी ने पुछा। क्या हुआ जी ? आप इतने परेशान क्यों हो ? वह कहता है। आज मैं एक नया समान लेने बाज़ार गया था। जो मुझको नहीं मिला। उसकी पत्नी बोलती है। ऐसा क्या था ? जो नहीं मिला। वह बोलता है विचार। पत्नी कहती हैं। धन्य हो प्रभु आप पागल तो नहीं हो। दुकानदार कहता है। तेरा दिमांग तो खराब नहीं हो गया है। जा अपना काम कर समझी। मैं ही पागल हुँ , जो तुझको बताया। आप खा-मा-खा उस विचार के चक्कर में परेशान हो रहे हों। इसका मतलब होता है। जो हम सोचते है। उनको ही अपने विचार कहा जाता हैं।
उसकी पत्नी इतना कहती है। स्वामी ऐसी कोई बस्तु बनी ही नहीं है। जो आप बाज़ार से खरीद कर ला सको।
उसका पति कहता है। अच्छा वो कैसे बताऔं ? उसकी पत्नी कहती हैं। स्वामी ये तो हमारे विचार होते हैं। जब हम कूछ सोचते है। जैसे कही पर जाने का विचार करना ? या कुछ खाने का विचार आना ? इतना कहकर उसकी पत्नी वहाँ से चली जाती हैं। नल पर पानी भरने। वह सोचकर हैरान हो जाता हैं। मुझको इतना भी नहीं पता है। अब दुकानदार खुश होकर अपनी दुकान चलाने लगता है।
अब अगले दिन तिरलोक के पिताजी उसको फिर से याद दिलाते हैं। कल याद है न। कहाँ जाना है तुझको वो कहता है। हाँ पिताजी। मुझको कल एक बैठक में जाना है। अब उसके मन में एक सबाल आ रहा था। मुझको तो विचार कहीं मिला ही नहीं है। कल बैठक में कैसे दूगा। मैं विचार ,फिर वह अपने पिताजी से पूछता है। ” पिताजी यह विचार कहाँ पर मिलते हैं ? और कितने रूपए किलों ? ” उसके पिता कहते है। वाह! मेरे बेटे तुझको यही नहीं पता। विचार क्या होते हैं ? तू तो गधा , नालायक और बेबकूफ ही रहेगा। जा अन्दर चला जा कल कही मत जईऔ। मैं खुद ही चला जाउँगा । इतना सुना कर उसके पिता बाज़ार चले जाते हैं। तिरलोक कमरे में जाकर रोने लगता है।
तभी उसकी माँ आ जाती हैं। पूछती है क्या हुआ लोक को ? क्यों रो रहा है मेरा तिरलोक ? इतना कहकर तिरलोक अपनी माँ को सारी बात बताता है। फिर पूछता है ये विचार क्या होता है ? फिर उसकी माँ उसको पहले चुप करवाती है। फिर प्यार से समझाती है। विचार कोई बस्तु नहीं होती है। ये तो हमारे दिमांग में जो हम सोचते रहते है। उनको ही विचार कहते है। तभी तिरलोक अच्छा माँ ये होते है विचार। इतना कहकर तिरलोक अपनी माँ की गौद में सौ जाता हैं।

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