चंतन बेचारा मूर्ख और चोर ठहरा डरपोक

एक आदमी होता है। जो घर से बाजार जा रहा होता है। वह बहुत ही मूर्ख होता हैं।

अब वह घर से थोड़ा ही आगे गया था , कि उसको एक व्यक्ति मिलता है।
जिसका नाम कालू होता है। वह अपनी भैसों को घर ला रहा होता है।

‍” तो वह उससे बोलता है , भाई कहाँ जा रहे हो कुछ बता तो दे।” मैं भी साथ चलता हूँ ।
तो वह कुछ नही बोलता है। मुँह फैर कर चला जाता हैं।
जैसे की कालू उससे पैसे छिन लेगा।
अब उस आदमी को चलते-चलते काफी समय हो जाता है। उसका नाम चंदन होता है।

वह पिछे देखता है, तो उसको आपना गाँव नहीं दिखता है। उसके गाँव का नाम कपल पूर होता है।
चंदन को लगता है। वह अब थक चुका है। तो वह देखता है , एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ लगा है।
साथ ही बहीं एक कुँआ भी होता है। तो वह सोचता है , क्यों ना

मैं थोड़ा आराम कर लू।
बहुत अच्छा पेड़ भी है और बहीं पर एक कुँआ भी। यहीं अपना भोजन भी कर लूगा।
माँ ने भी कहाँ था, कहीं छाह में बैठर भोजन कर लेना भूखा मत रहना।
अब वह उस पीपल के पेड़ की नींचे बैठ जाता है और अपना भोजन दैखता है ,कि

माँ ने क्या बनाया होगा? अब तो रहा नहीं ज रहा हैं। पेट में भी अब चुहें कुद रहें हैं।
मन-ही-मन वह बहुत खुश होता हैं। क्योंकि खाने से बहुत अच्छी खुशबु आ रही होती है।
जैसे वह भोजन देखता है तो उसमें पूड़ी और आलू की सब्जि होती है।

चंदन तुरन्त भोजन खाना आरम्भ कर देता है। आराम से खाता है, बिल्कुल पूरा स्वाद लेकर।
भोजन खाकर वह पानी पीने के लिए कुँऐ के पास जाता है , तो एक रस्सी से बँधी।
वहाँ पर एक बाल्टि होती है, जिसकों वह कुँऐ में फेकता है और कुँऐ से पानी बाहर निलता है।
देखता है कुँऐ का पानी बहुत साँफ होता हैं। जब वह उस जल को पीता है।
तो उसको बहुत आनन्द आता है और जल भी बहुत मिठा होता हैं।
अब वह सोचता है। थोड़ा और बैठ लेता हूँ। शायद आगे ऐसी जगह न मिले आराम करने को।
बैठे-बैठे उसको निद आ जाती है और चंदन सो जाता
है। अब वहाँ पर एक डरपोक चोर आता है।
जिसने कभी चोरी नहीं की होती है , तो वह वहीं बैठ कर चंदन का सारा खाना खा लेता।

साथ ही उसको उठा कर बोलता है। चलो उठ जाओं अब घर चलना है।
चंदन तुरन्त उठ कर बैठ जाता हैं और बोलता है ” कौन हो तुम”?
चोर डर जाता है वो “कहता है मैं तुम्हारा मित्र हूँ। चंदन कहता है आच्छा मित्र हो मेरे।
आखिर चंदन भी तो मूर्ख होता है। सुनों मैं बाजार जा रहा हुँ। चलों तुम भी मेरे साथ चलों।

चोर कहता हैं तुम मत जाओं मुझकों पैसे दे दो। मैं तुम्हारे घर सामान लेकर पहुँचा दूगा।
चंदन अब थोड़ा आलास खा रहा था , तो उसने उस अनजान व्यक्ति को सारे पैसे दे दिए।
पूरे 5 रूपै थे।चंलन ने थोड़ा भी नहीं सोचा , कि वह आएगाँ भी य नहीं।
मूर्ख चंदन बापस अपने गाँव लोटने लगा। चोर डरपोक तो था , लेकिन दिमांग दार था।
उसने चंदन से कहाँ मैं आता हूँ। तुम घर पहुँचो मित्र।
मैं तुम्हारा सारा समान लेकर आता हूँ।
अब चंदन तो ठहरा मूर्ख चोर की तो आ गई मोज।बो तो गया अपने घर।

चंदन अपने घर पहुँच कर माँ से बोलता है। माँ देख तेरे बेटे ने एक आदमी को मूर्ख बना दिया।
मैंने उसको सारे पैसे दे कर समान लाने को कहाँ है और
वह लाने गया है। वह मेरा मित्र है।
माँ कहती हैं पागल, बुध्दु, गधे, मूर्ख है तू। कोई रास्ते में मिल गया और तू उसको सारे पैसे दे आया।
चंदन को बहुत डाटती है और समझाती भी है। बेटा किसी से रास्ते में बात नहीं करते।
ना किसी का कुछ खाते और ना किसी को अपना कुछ देते है।
बेचारा चंदन बहुत रोता है और रो कर सो जाता हैं।

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